आज फिर एक याद है आई, 

जो तेरी तरफ मेरी ध्यान खींच लायी:

सोचता हूँ  जारी कर दूँ मै एक फरमान 

जिसपे लिखा हो बस तेरा नाम, 

जनता हूं तुम्हें पसंद नहीं मेरी ज़ुबान।

इस लिए कहते हैं कुछ लोग, 

मुझे काफीरो की दुकान, 


मोहब्बत का इज़हार  तो करुंगा, 

भरे बाजार में फिर चाहे तुम्हें शर्मशार करुंगा, 

निगाहें तुम मत चुरा लेना हमसे,

खुद की निगाहें मे मत गिरा लेना ख़ुद को, 


तुम्हारे रास्ते का सफर चाहुं तो खुद तय करूँ, 

जीवन की लकीरें में इतना धन वान हूं, 

पर तुम कोई काफीर नहीं, 

जिससे मै चाह रखूँ, 


इतनी होगी तंग तुम, 

अगर नींद में होंगे  संघ हम, 

वादा करता हूं तुमसे मै। 

चहे भूलना चाहोगी हमे, 

कण कण करेंगे मेरे लय,


अंखे बंद करके जब धयान करोगी, 

तब तस्वीर मेरी तुम साफ देखोगी, 

तब लगता कोई था साथ कहोगी, 


कवियों के घराने का, 

छोटा सा ही श्रेणी हूँ, 

इस छे रस की दुनिया में, 

मै नौ रस का प्रेमी हूं! 

-----------------------------रितिक सिंह साहिब 


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