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  अकेले पन कि बात करते हो,  पर अकेले रहने मे डर ते हो,  जिंदगी कोई वो किनारा नही!  जो खाली अकेले पन से तरक्की करे,  और बात रही सक्सेस की,  बो तो मेहनत से ही आती है,  अकेले पन की बात करना तो अच्छा लगता है,  पर रह के देखो कितना दर्द सा लगता है  - - - - - रीतिक सिंह साहिब
  संसार की एक अजीब दास्तां अजीब पहेली है इस संसार के रीति की | खुद ही बिगाड़ ता है,और आशा करता है . सच्चाई  की प्रीत की! अब तो अंदर से आवाज़ आती है; जो इस दुनिया की नज़रिए को देखकर  बौखला जाती है! जीवन में सुखी के पल तो कई बार आते हैं। पर हर श्रेणी में स्थिर रहने वाले मनुष्य ही,  बुद्धिमान कहलाते हैं।। कई बार जीवन के पड़ाव में ठोकर खाकर हम  सब बिखलाते हैं। पर  सच्चे है वही जो खुद को  संभाल लेते हैं; किसी का आना जाना तो जीवन  का निरंतर नियम है।। पर दुनिया की नजरों से अलग होकर:  आशय की मदद करने वाला  ही. ईश्वर द्वारा रचित सच्चा मनुष्य का उदाहरण है। ---------  जय हिंद ------------ ऋतिक सिंह साहिब
  जिंदगी एक खोज है,  कोई सोच नहीं!  राहों का चैन आसान है !  पर उन पर चलना नही,  जिंदगी के रूप बहुत,  पर  मुकाम नहीं,  मनन करना कोई हल नहीं!  जो पेड़ से गिरे जिंदगी कोई फल नहीं,  हासिल करने का कोई मंत्र नहीं!  जो कर्म करें सब से बड़ा श्रमिक वही,  - - - - - - रीतिक सिंह  साहिब
  रंगों का मौसम है,  फागुन का अगमन है | आज खुले असमान मे,  होली का अगमन है,  बहारें तो हैं हमारे जीवन में: पर उनका क्या जो बैठें हैं : रक्षा करने हिंदुस्तान की सरहादों पे,  जिसने खोए है अपने लाल,  इस देश कि कुर्बातों में!  रंगों का अगमन है,  फागुन के इस मौसम में : कल देखा एक इंसान  घर में अकेला  बैठा दुनिया से लाचार,  खिदमत  कि थी जिसने कभी किसी कि: आज वही ठोकर खाया,  संसार के रित से!  होली का मौसम था रंगीन : रंगो कि फिजाओं में सभी थे लीन,  पर किसी ने ना सोची लाचार, लोग,  गरीब परिवार, सहीद जवान का छोटा सा असियाना है किसके अधीन!  रंगो का मौसम है,  फागुन का अगमन है!  - - - - - - - - रितिक सिंह साहिब 
  जब याद तेरी आती है,  तो होठो से गुनगुनाता हु,  शायरी तेरी अकाड की।  हमेसा दोहराता हु,  उसे अपने कलम से गीतों में दोहराता हुं।  महाकाल के भक्त है,  मौत से डरते नहीं,  आज लिखते है ये खत  तेरी यादो मे सही, 
  कवि हु कवि की जुबानी लिखता हूं।  अरमानों का तो पता नहीं ,  पर फिर भी जिंदगानी लिखता हू ,  अंदाज तो शायरो के नहीं ,  पर फिर भी एक जुबानी कहता हू ,  जिन्दगी की हर मोड़ के ,  एक कहानी लिखता हू ,  क्या पता शायद ,  इसी मे अपनी जिंदगानी लिखता हू ,  ----रीतिक सिंह साहिब 
  अब जो कहते है,  तो एक तस्वीर बन आती है,  कैसै कहें जिसने हमे बर्बाद किया.  उसी की यादें अब आती,  भूला चुका हूँ मै खुद को,  अपने काबिलियत और शकशीयत,   जिनसे मुझमे नूर था,  रव ना करे कि तुम्हारा भी दिल दुख जाए,  पर बता तो दिया होता कि ,  तुमसे दिल लगाने मे मेरा क्या कुसूर था,  --------------------रितिक सिंह साहिब