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Showing posts from February, 2021
  अकेले पन कि बात करते हो,  पर अकेले रहने मे डर ते हो,  जिंदगी कोई वो किनारा नही!  जो खाली अकेले पन से तरक्की करे,  और बात रही सक्सेस की,  बो तो मेहनत से ही आती है,  अकेले पन की बात करना तो अच्छा लगता है,  पर रह के देखो कितना दर्द सा लगता है  - - - - - रीतिक सिंह साहिब
  संसार की एक अजीब दास्तां अजीब पहेली है इस संसार के रीति की | खुद ही बिगाड़ ता है,और आशा करता है . सच्चाई  की प्रीत की! अब तो अंदर से आवाज़ आती है; जो इस दुनिया की नज़रिए को देखकर  बौखला जाती है! जीवन में सुखी के पल तो कई बार आते हैं। पर हर श्रेणी में स्थिर रहने वाले मनुष्य ही,  बुद्धिमान कहलाते हैं।। कई बार जीवन के पड़ाव में ठोकर खाकर हम  सब बिखलाते हैं। पर  सच्चे है वही जो खुद को  संभाल लेते हैं; किसी का आना जाना तो जीवन  का निरंतर नियम है।। पर दुनिया की नजरों से अलग होकर:  आशय की मदद करने वाला  ही. ईश्वर द्वारा रचित सच्चा मनुष्य का उदाहरण है। ---------  जय हिंद ------------ ऋतिक सिंह साहिब
  जिंदगी एक खोज है,  कोई सोच नहीं!  राहों का चैन आसान है !  पर उन पर चलना नही,  जिंदगी के रूप बहुत,  पर  मुकाम नहीं,  मनन करना कोई हल नहीं!  जो पेड़ से गिरे जिंदगी कोई फल नहीं,  हासिल करने का कोई मंत्र नहीं!  जो कर्म करें सब से बड़ा श्रमिक वही,  - - - - - - रीतिक सिंह  साहिब
  रंगों का मौसम है,  फागुन का अगमन है | आज खुले असमान मे,  होली का अगमन है,  बहारें तो हैं हमारे जीवन में: पर उनका क्या जो बैठें हैं : रक्षा करने हिंदुस्तान की सरहादों पे,  जिसने खोए है अपने लाल,  इस देश कि कुर्बातों में!  रंगों का अगमन है,  फागुन के इस मौसम में : कल देखा एक इंसान  घर में अकेला  बैठा दुनिया से लाचार,  खिदमत  कि थी जिसने कभी किसी कि: आज वही ठोकर खाया,  संसार के रित से!  होली का मौसम था रंगीन : रंगो कि फिजाओं में सभी थे लीन,  पर किसी ने ना सोची लाचार, लोग,  गरीब परिवार, सहीद जवान का छोटा सा असियाना है किसके अधीन!  रंगो का मौसम है,  फागुन का अगमन है!  - - - - - - - - रितिक सिंह साहिब 
  जब याद तेरी आती है,  तो होठो से गुनगुनाता हु,  शायरी तेरी अकाड की।  हमेसा दोहराता हु,  उसे अपने कलम से गीतों में दोहराता हुं।  महाकाल के भक्त है,  मौत से डरते नहीं,  आज लिखते है ये खत  तेरी यादो मे सही, 
  कवि हु कवि की जुबानी लिखता हूं।  अरमानों का तो पता नहीं ,  पर फिर भी जिंदगानी लिखता हू ,  अंदाज तो शायरो के नहीं ,  पर फिर भी एक जुबानी कहता हू ,  जिन्दगी की हर मोड़ के ,  एक कहानी लिखता हू ,  क्या पता शायद ,  इसी मे अपनी जिंदगानी लिखता हू ,  ----रीतिक सिंह साहिब 
  अब जो कहते है,  तो एक तस्वीर बन आती है,  कैसै कहें जिसने हमे बर्बाद किया.  उसी की यादें अब आती,  भूला चुका हूँ मै खुद को,  अपने काबिलियत और शकशीयत,   जिनसे मुझमे नूर था,  रव ना करे कि तुम्हारा भी दिल दुख जाए,  पर बता तो दिया होता कि ,  तुमसे दिल लगाने मे मेरा क्या कुसूर था,  --------------------रितिक सिंह साहिब 
  गजल ए परमात्मा   ले आज उठ खड़ा है,        तेरा लाल,  अब करले तू उस ,  परमात्मा को धन्यवाद्,  जो सार्व शक्तिमान है,  उसके मस्तिष्क में विराजमान है,  जो कर्म है वो कर्ता,  जिसकी आसना वो कर्ता,  आज उसी पे वो विराजमान है,  क्यूंकी वो मनुष्य,  नहीं भागवान सार्व शक्तिमान है,  (2) - - - - - रीतिक सिंह साहिब 
  अब जो कहते है,  तो एक तस्वीर बन आती है,  कैसै कहें जिसने हमे बर्बाद किया.  उसी की यादें अब आती,  भूला चुका हूँ मै खुद को,  अपने काबिलियत और शकशीयत,   जिनसे मुझमे नूर था,  रव ना करे कि तुम्हारा भी दिल दुख जाए,  पर बता तो दिया होता कि ,  तुमसे दिल लगाने मे मेरा क्या कुसूर था,  --------------------रितिक सिंह साहिब
  समय-समय का खेल है।। अब जीवन कि एक रेल है, अब मनुष्यों के लिए नहीं, अबकरणो के लिए समय का रेल है समय-समय का खेल है। न किसी से मोह है , न किसी से स्‍नेह। अब तो बस जरूरत मंद से मिलाप ,  और काम से ही राग और अनुराग। समय-समय का खेल है ।।   -----------   रितीक सिंह साहिब
                   चेतावनी   जंग की है गुहार अब,  ताकत की वार अब; बहुत बर्दाश्त हुआ जिंदगी की,  ये सार अब ; कभी ना सोचा था,  जो काम उसपे विश्वास हुआ अब,  इसीलिए जंग की एलान अब; आँखों की अंधी है, जो तुमपे धूल सी छाती है फिर से है जंग की गुहार अब,  ताकत की वार अब | --------------------रितिक सिंह साहिब 
साल साल जोड के ,अभि तो बालिक हुए हो तुम। इश्क मोहव्वत तो ठिक है , तुमहे पता है किस हाल में पडे हो तुम, जुमले शायरियां तो ठिक है, कया उसके दिल का राज जानते हो तुम। गजलें पंकतीयां लिखते हो ,ये सब तो ठिक है, पर क्या उसके जिवन का हाल जानते हो तुम ।।  ---------------रितिक सिंह साहिब  
  पानी में बूंद सी छलकने,  की एक अवाज हो जाए!  वैसे इस विराट् से संसार में,  हमारी भी जैकार हो जाए,  अभी तो सफर की बस शुरूआत है,  नाम बनाने की एक आस हैं,  गुंजने की चाह है ,  की हम चल जीस पर रहे है,  ये तो एक राह है,  उचाईयाॉ यूँ नहीं मिलते बस चाह से,  श्रम करो और देखो मंज़िल,  झुके गि तुम्हारे बाह मे : --------------------------रीतिक सिंह साहिब 
           सृष्टि की विडंवना कुदरत के कई करिशमो में, एक अबाज निराली है। जो की एक प्रेम कि, एक प्रणाली है ; जितना कहा जाए उतना कम है, और जिवन एक एसे रहस्य का नाम है, इस संसार की अलोचना मे। जिसमे भंती भंती के गुण है ; कभी हम टुटते और विखरते हैं । तो कभी मुसकुरा कर संसाधनों की आलोचना करते है; कभी हम सृस्टि के रचइता को कोसते हैं; तो उनको अपने सा हाय के लिए धन्यवाद करते हैं। ----------------रितीक सिंह साहीब
  सागर की लहरों मे,  अवाज की पहचान हो; इन जमानो कि उमंग मे | ये प्यारा देश भी तरक्कीवान हो ; सियासत के खेल मे एक मोहरा आज अया है,  ना जाने एक दूसरों पर टिप्पणी करके,  इन सरकारों ने क्या पाया है | ये जलन कि भावना,  मज़हब की लड़ाई,  प्यार के ढाकोसले ; आपसी रंंजिशें | ना जाने कब फिर अस्तापित होंगी वो अखंड भारत कि बरसातें¦ ----—-------------रितिक सिंह साहिब 
  जिंदगी की राह पर चल रही,  है वो घड़ी.  ना साँस है, ना चैन है,  मन भी बेचैन है,  अब तो लगता है कि,  सब खत्म सा हो रहा,  ना आसा है ना मर्ग,  बस अब दिखता है,  तो ये तेरा प्यार ,  भुला नहीं हुं उन,  वादों को, कसमें और,  अपने इरादों को,  पर क्या करूँ,  आज लाचार सा हुं,  जिंदगी में कहीं विचार,  सा हूँ,  -------- रीतिक सिंह साहिब 
  समुन्दर कि लहरों को उठते देखा है,  नीर की धार को बहते देखा है ; असमानो को चमकते देखा है,  जुगनू को गिरते देखा है | किस्मत को बदलते देखा है,  सपनो को बिखरते देखा है ; अं सु को बहते देखा है ; प्रकृति को घुस्साते देखा है | फिर इनसे ही तो जीना सीखा है,  हर एक माहोल में ढलना सीखा है ; अंदर से कितना भी क्यू ना टूट जाऊँ,  पर फिर भी मुस्कुराना सीखा है ¦ -----------------------------------रितिक सिंह साहिब 
  बेजुबान सा परिंदा हुँ,  दिल से मै लिखता हुं ; सब कुछ जानते हुए भी,  खामोश सा मै रहता हुं | हर चीजों को देख कर भी,  कुछ ना कहता हूँ | आँखों कि चोल मिचौली,  सांसो कि अब ताल है ; जब से मेरे नैना मिले हर,  क्षण एक साल है; लगी है बंदिशें दूसरो के; पैमानो के,  फिर हम कैसे कह दें| उसे अपना मान के ; कहते हैं तराने जो दिल जोड़ते हैं,  फिर कभी खाके चोट वो वगैरत बने घूमते हैं | ----------रितिक सिंह साहिब 
  जिंदगी हमेशा भरी सी थी,  पर आज लगा वो खाली सी है ; पर आज पता चला,  की उसमे कोई नहीं,  बस वो बीन पेनदी।  की थाली सी है,  हसरतें शौहरत और गुरुर सी है ; बस जिंदगी में कोई तवज्जु देने को नहीं है,  क्या करू पता नहीं,  अपनी जिंदगी में मैं पागल सा हूं,  ना किसी ने पूछा ना किसी को पाया!  बस मुझे अपने आप को खोने का डर है | -------------रितिक सिंह साहिब 
  आज फिर एक याद है आई,  जो तेरी तरफ मेरी ध्यान खींच लायी: सोचता हूँ  जारी कर दूँ मै एक फरमान  जिसपे लिखा हो बस तेरा नाम,  जनता हूं तुम्हें पसंद नहीं मेरी ज़ुबान। इस लिए कहते हैं कुछ लोग,  मुझे काफीरो की दुकान,  मोहब्बत का इज़हार  तो करुंगा,  भरे बाजार में फिर चाहे तुम्हें शर्मशार करुंगा,  निगाहें तुम मत चुरा लेना हमसे, खुद की निगाहें मे मत गिरा लेना ख़ुद को,  तुम्हारे रास्ते का सफर चाहुं तो खुद तय करूँ,  जीवन की लकीरें में इतना धन वान हूं,  पर तुम कोई काफीर नहीं,  जिससे मै चाह रखूँ,  इतनी होगी तंग तुम,  अगर नींद में होंगे  संघ हम,  वादा करता हूं तुमसे मै।  चहे भूलना चाहोगी हमे,  कण कण करेंगे मेरे लय, अंखे बंद करके जब धयान करोगी,  तब तस्वीर मेरी तुम साफ देखोगी,  तब लगता कोई था साथ कहोगी,  कवियों के घराने का,  छोटा सा ही श्रेणी हूँ,  इस छे रस की दुनिया में,  मै नौ रस का प्रेमी हूं!  -----------------------------रितिक सिंह साहिब 
  तारो के नाम पे,  एक पैगाम लिखी है ; फिर कही मेरी जुबान | आज तेरे नाम फिसली है,  ठोकर खा के जिंदगी जिया हैं ; हमेशा मेहनत का फल,  मुह के बल, गिर के पाया है ; दलदले सी एक तासीर है,  मेरी जिंदगी की ; जिसमे साहसो के बाद भी,  चोट खाई है मैंने,  ये बता नहीं रहा,  की तुम कुछ जानो हमारे बारे में ; बस एहसास कर लो,  अपनी गलती के अंजामो का | जिंदगी हमारी एक खुले किताब सी है,  और बटी सिक्कों के दो भाग सी है ; और जो जानने की कोशिस करते हैं,  उन्हे खुद से रुक्सत सी हो जाती है | ------------------------रितिक सिंह साहिब 
  kade na sochi hal mere dil da,  eh to hoya kusur sade fikr da.  soneyo eh gal ta sachi aa,  ki eh kusur thoda ni,  mare dil da,  sache badsah de waste,  tenu so e,  gal dil de dasi,  ki tu vi menu  pasand ni kardi si,  sadya te nasiba vich hi,  kuch na likhya,  chnga bas eko payar hoya; thode waste aaj oh vi kho liya¦ -------------Ritik singh sahib 
  Soch ek keher Zindagi mein to bahut kuch h,  Par dhyan bas ek taraf,  Yado ko bhulane ki kosis bahut h,  Par anjam ek taraf,  Kabhi baitha hu akela to ek khayal ata h,  Bus is sansar ko le kar ek sawal ata h,  Shayad ye rit h ya prakriti ka varchasva,  Jo insan ko swabhaw se hi janawar banata h,  Kehte hai jo karte h,  Wo hi bhogte h,  To ku garib mehnat karne k bad bhi rote hai,  Agr koi kahe ye unki naseb h,  To wo galat h kui ki sansar ke anusar to kismat hm khud banate,  Inhi sabk beech  ek khayal aata hai,  Ki apni zindagi ki taraf dhyan ata h,  Jab aankh khulte hai to bas ek sailaab ata h,  -------Ritik singh sahib
          भरोसे की तालीम ना हो किसी की हार फिर,  आज हो एक बिस्तार फिर | भरोसे पे हो अमल फिर,  और हो वादों का सार फिर ; अनंत सी हो विश्वाश फिर,  कभी ना टूटे वो ब्यबहार फिर : आज हो अमल एक बार फिर,  ना हो मौत की वार फिर ; रहे सदा विश्वास फिर,  गीतों का हो सार अब; कलम मे हो धार अब,  दिखे आज धोखेबाज़ फिर| पैदा हुआ दरार फिर,  अब कलम की तालीम है ; गजल की अमीन है,  अज फिर भरोसे की तालीम है | ------------------रितिक सिंह साहिब