रंगों का मौसम है, 

फागुन का अगमन है |


आज खुले असमान मे, 

होली का अगमन है, 

बहारें तो हैं हमारे जीवन में:

पर उनका क्या जो बैठें हैं :

रक्षा करने हिंदुस्तान की सरहादों पे, 

जिसने खोए है अपने लाल, 

इस देश कि कुर्बातों में! 


रंगों का अगमन है, 

फागुन के इस मौसम में :


कल देखा एक इंसान 

घर में अकेला  बैठा दुनिया से लाचार, 

खिदमत  कि थी जिसने कभी किसी कि:

आज वही ठोकर खाया, 

संसार के रित से! 


होली का मौसम था रंगीन :

रंगो कि फिजाओं में सभी थे लीन, 


पर किसी ने ना सोची लाचार, लोग,

 गरीब परिवार,

सहीद जवान का छोटा सा असियाना है किसके अधीन! 


रंगो का मौसम है, 

फागुन का अगमन है! 

  • - - - - - - - - रितिक सिंह साहिब 



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