तारो के नाम पे,
एक पैगाम लिखी है ;
फिर कही मेरी जुबान |
आज तेरे नाम फिसली है,
ठोकर खा के जिंदगी जिया हैं ;
हमेशा मेहनत का फल,
मुह के बल,
गिर के पाया है ;
दलदले सी एक तासीर है,
मेरी जिंदगी की ;
जिसमे साहसो के बाद भी,
चोट खाई है मैंने,
ये बता नहीं रहा,
की तुम कुछ जानो हमारे बारे में ;
बस एहसास कर लो,
अपनी गलती के अंजामो का |
जिंदगी हमारी एक खुले किताब सी है,
और बटी सिक्कों के दो भाग सी है ;
और जो जानने की कोशिस करते हैं,
उन्हे खुद से रुक्सत सी हो जाती है |
------------------------रितिक सिंह साहिब
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