समुन्दर कि लहरों को उठते देखा है,
नीर की धार को बहते देखा है ;
असमानो को चमकते देखा है,
जुगनू को गिरते देखा है |
किस्मत को बदलते देखा है,
सपनो को बिखरते देखा है ;
अं सु को बहते देखा है ;
प्रकृति को घुस्साते देखा है |
फिर इनसे ही तो जीना सीखा है,
हर एक माहोल में ढलना सीखा है ;
अंदर से कितना भी क्यू ना टूट जाऊँ,
पर फिर भी मुस्कुराना सीखा है ¦
-----------------------------------रितिक सिंह साहिब
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