पानी में बूंद सी छलकने,
की एक अवाज हो जाए!
वैसे इस विराट् से संसार में,
हमारी भी जैकार हो जाए,
अभी तो सफर की बस शुरूआत है,
नाम बनाने की एक आस हैं,
गुंजने की चाह है ,
की हम चल जीस पर रहे है,
ये तो एक राह है,
उचाईयाॉ यूँ नहीं मिलते बस चाह से,
श्रम करो और देखो मंज़िल,
झुके गि तुम्हारे बाह मे :
--------------------------रीतिक सिंह साहिब
Comments
Post a Comment