बेजुबान सा परिंदा हुँ, 

दिल से मै लिखता हुं ;

सब कुछ जानते हुए भी, 

खामोश सा मै रहता हुं |


हर चीजों को देख कर भी, 

कुछ ना कहता हूँ |

आँखों कि चोल मिचौली, 

सांसो कि अब ताल है ;


जब से मेरे नैना मिले हर, 

क्षण एक साल है;

लगी है बंदिशें दूसरो के;

पैमानो के, 


फिर हम कैसे कह दें|

उसे अपना मान के ;

कहते हैं तराने जो दिल जोड़ते हैं, 

फिर कभी खाके चोट वो वगैरत बने घूमते हैं |

  • ----------रितिक सिंह साहिब 



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